अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

भारत में महिलाओं का राजनीतिक विकास - डा० पुष्पा कश्यप


          विश्व का इतिहास और विश्व के प्रगतिशील देशों की राजनीति, सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति इस बात का प्रमाण है कि किसी भी देश की वांछित प्रगति के लिए उस देश की महिलाओं की भागीदारी आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा द्वारा घोषित ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय  महिला वर्ष’’ एवं ‘‘महिला दशक 1990-2000’’ की समाप्ति तक भी भारत की सम्पूर्ण कार्यात्मक शक्ति में महिला कार्यकर्ताओं की संख्या कम है। विश्व की आधी शक्ति एवं क्षमता होने के बावजूद राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका, उनकी कम भागीदारी तथा कमजोर स्थिति और सहभागिता पर प्रश्नचिन्ह यथावत लगा हुआ है। भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए किसी प्रकार का प्रतिबन्ध न होने के बावजूद भी वे भारत के आम चुनावों में बहुत कम संख्या में भाग लेती हैं तथा जो भाग लेती हैं वे प्रायः राजनीति की ऊँची कुर्सी तक पहॅुचने अथवा उसे प्राप्त करने में असमर्थ रहती हैं।
  समाज की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में सत्ता के समीकरणों में प्रायः अपराध, अव्यवस्था एवं घोर स्वार्थ की राजनीति है। भारत में महिलाओं की राजनीतिक क्रियाशीलता को जानने के लिए यदि हम भारत के प्राचीन इतिहास का अध्ययन करें, तो हमें यह ज्ञात होता है कि भारत में पूर्ववैदिक काल में मातृ-सत्तात्मक परिवार थे परन्तु धीरे-धीरे मध्यकाल तथा आधुनिक काल में भारत में महिलाओं की स्थिति बिगड़ती गयी। भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में महात्मा गांधी के विशेष प्रेरणा एवं प्रोत्साहन से महिलायें देश के राजनीतिक क्षेत्र में आगे आईं। सुधार वादी आन्दोलन के फलस्वरूप भारत के राजनैतिक इतिहास में कई नारियों ने नवयुग के आरम्भ की सूचना दी, जिनमें एनी बेसेन्ट, सरोजिनी नायडू तथा बेगम अम्मन बीबी मुख्य थीं। 1921-22 के असहयोग आन्दोलन में हजारों स्त्रियाँ वोट देने तथा आन्दोलन में भाग लेने निकल पड़ी। 1906 से स्त्रियाॅ व्यवस्थापक मण्डल की सदस्या होने लगीं। 1929-32 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दिनों में भारतीय स्त्रियों की यह जागृति और व्यापक हो गयी। तीन हजार से अधिक स्त्रियों ने जुलूसों में भाग लिया, शराब और विदेशी माल की दुकानों पर पिकेटिंग किया, लाठी प्रहार सहा, कठोर जेल यातनायें सहीं, सजायें भुगतीं तथा अपने देश के चरणों पर बलिदान किया। 1942 की जनक्रंाति ने नारी जाति के हृदय की विद्रोही भावनाओं को बड़ी तीव्रता के साथ जागृत किया। स्कूल कालेज में पढ़ने वाली छात्रायें, गृहस्थ महिलायें सभी ने अपने हृदय की असंतोष भावना का प्रदर्शन किया और इस आंदोलन में भाग लिया अनेक महिलाओं को कारागार में बन्द कर दिया गया। स्वाधीनता के पश्चात् स्वतंत्र भारत के संविधान में भारतीय महिलाओं को भिन्न-2 क्षेत्रों में समानता के अधिकार प्रदान किये गये हैं, परन्तु विडिम्बना यह है कि उन्हें अब तक भी समाज में समानता के अधिकार नहीं मिले हैं। भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और देश के महत्वपूर्ण पदों पर उनकी उपस्थिति नहीं के बराबर है। आर. सी. सक्सेना ने एक अध्ययन में स्पष्ट किया है कि महिलायें उन्हीं गतिविधियों के भाग लेती हैं, जिनमें भाग लेने के लिए उनके परिवार के पुरूष कहते हैं। राजनीतिक घटनाओं और गतिविधियों के प्रति उनका अपना कोई निर्णय नहीं होता है। ऊषा मेहता और बी कम्पुस्वामी के अनुसार भी स्वतन्त्र भारत की महिलाओं में सामाजिक जागरूकता और राजनैतिक चेतना का अत्यधिक अभाव है तथा स्वन्त्रता के पूर्व महिलाओं की राजनीतिक गतिविधियाँ अत्यधिक सीमित थीं।
संयुक्त राष्ट्रसंघ विकास कार्यक्रम द्वारा वर्ष 1995 में बीजिंग में हुए विश्व महिला सम्मेलन से पहले जारी की गयी मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व की संसदों में महिलाओं की औसत संख्या पुरूषों की तुलना में मात्र 10 प्रतिशत थी और मंत्री स्तर की स्थिति तो और भी दयनीय बतायी गयी थी इसमें तो महिलाओं का औसत 6 प्रतिशत ही था। भारत में आजादी के 60 वर्ष बीत जाने के पश्चात् भी प्रतिनिधियों में महिलाओं के लिए स्थान कम है, यह 10 प्रतिशत से ऊपर नही जा सकी है। इसलिए किसी भी प्रकार का कोटाध्आरक्षण को लागू कर महिलाओं के लिए स्थान बनाना पड़ेगा ताकि महिलाओं को राजनीति में भागीदारी का अवसर प्राप्त हो सके। महिलाओं को अपने अधिकारों को वास्तविक रूप में प्राप्त करने के लिए अब स्वयं को समर्थ और जागरूक बनाना होगा।
भारत में महिलाओं की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए अनेक अधिनियम बनाये गये हैं इनमें सती प्रथा के विरूद्ध अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम, बाल विवाह निषेध अधिनियम तथा दहेज विरोधी अधिनियम मुख्य हैं। अब तक की नौ पंचवर्षीय योजनाओं में लगभग सभी में महिला शिक्षा एवं परिवार कल्याण योजनाओं को सम्मिलित कर सरकारी स्तर पर कार्यान्वयन का गंभीर तथा महत्वपूर्ण प्रयास किया गया है। भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर दृष्टिपात करने से यह स्पष्ट जानकारी मिलती है कि यहाँ के राजनीतिक क्षेत्र में कुछ महिलाओं ने स्वयं के बलबूते पर महत्वपूर्ण स्थिति बनायी है, जिसमें श्रीमती इंदिरा गांधी का देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होना तथा राष्ट्रीय एवं अन्र्तराष्ट्रीय क्षेत्र में श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित एवं सरोजनी नायडू का महत्वपूर्ण स्थान होना महिला राजनीतिक जागृति का शुभ संकेत है। इनके अतिरिक्त श्रीमती सोनिया गांधी, श्रीमती सुषमा स्वराज, सुश्री उमा भारती, ममता बनर्जी, गिरजा व्यास, मेनका गांधी, मारगे्रट अल्वा तथा उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती एवं अन्यान्य महिलायें प्रमुख हैं। ये महिलायें अपनी प्रतिभा, लगन एवं सूझबूझ तथा संघर्ष करने की क्षमता के बूते आगे बढी हैं। यद्यपि आज का प्रदूषित, राजनीतिक वातावरण महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र के लिए किसी प्रकार का आकर्षण नहीं देता, इसके उपरान्त भी भारतीय महिलायें अपनी राजनीतिक चेतना की अभिव्यक्ति करना चाहती हैं।
आज महिलायें अनेक समाजिक, राजनीतिक व आर्थिक मंचों पर अपना स्थान बना रही है। भारत में 1996 में हुए लोकसभा के चुनावों में 8619 पुरूष प्रत्याशियों में से मात्र 5.56 प्रतिशत प्रत्याशी ही विजयी घोषित हुए जबकि चुनाव लड़ने वाली 325 महिला प्रत्याशियों में 11.38 प्रतिशत प्रत्याशी विजयी घोषित हुईं। इसी प्रकार फरवरी 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में 59 महिला उम्मीदवारों में से कुल 19 महिलायें विजयी रहीं। पंचायत स्तर की राजनीति में भी महिलाओं की भूमिका सक्रिय रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग के अनुसार 1995 में करीब 10 लाख महिला प्रतिनिधि पंचायतों में थीं जिनमें से करीब 75000 महिलायें अध्यक्ष के रूप में थीं।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के बारे में भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों के दृष्टिकोण की जानकारी करें तो ज्ञात होता है कि भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा पर्याप्त संख्या में महिलाओं को प्रत्याशी नहीं बनाया जाता है। मई, 1998 के लोकसभा चुनाव में दलों ने केवल 102 महिला प्रत्याशी मैदान में उतारे। इतनी कम संख्या में महिला प्रत्याशी मैदान में उतारने के पीछे राजनीतिक दलों का तर्क यह था कि सामान्यतया महिलायें चुनावों में जीत नहीं पातीं किन्तु ‘‘वूमेन्स पाॅलिटिकल वाच’’ नामक संस्था के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार राजनीतिक दलों की यह धारणा पूर्ण रूपेण निर्मूल, आधारहीन और गलत है।
‘‘वास्तव में भारत की आधी आबादी का एक बहुत बड़ा भाग अभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के पीछे भाग रहा है। विकास की धारा इन्हें प्रभावित नहीं कर पायी है। आवश्यकता इस बात की है कि इन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जाय। राजनीतिक विकास के मूलतः चार पक्ष हैरू-
1 राजनीतिक जागरूकता
2 राजनीति की भागीदारी
3 राजनीतिक नेतृत्व प्राप्त करना
4 नेतृत्व प्राप्त कर निर्णयों को प्रभावित करना और दिशा देना
  भारत के संविधान के 73वें संशोधन से स्थानीय स्वशासन में महिलाओं को आरक्षण प्रदान कर राजनीतिक विकास के लिए रास्ता बना दिया गया है, इस रास्ते पर चलना और आगे बढ़ना अब उनका दायित्व बन गया है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त विभिन्न अधिकारों तथा अधिनियमों के फलस्वरूप यद्यपि महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न हुई है। परन्तु इसकी मात्रा अत्यन्त कम है अथवा उच्च स्तर पर नही ंके बराबर है। आज बहुसंख्यक महिलायें राजनीति में आना ही नहीं चाहती हैं, इसके पीछे क्या कारण है इन पर विचार करना चाहिए। क्या महिलायें भारतीय संविधान में वर्णित राजनीतिक अधिकारों का समुचित उपयोग एवं उपभोग कर रही हैं? क्या वे राजनीतिक दलों के संगठन में प्रतिनिधि के रूप में राजनीतिक सत्ता का उपभोग करने में सफल हो पा रही हैं? प्रत्याशी के रूप में पुरूषों की तुलना में महिलाओं को किस सीमा तक सफलता मिल पा रही है? इन सभी प्रश्नों के व्यावहारिक पक्ष को देखने से यह स्पष्ट है कि वर्तमान समय में भारत में महिलाओं के राजनीतिक विकास में अनेकानेक बाधायें हैं। बाधायें ही उन्हें राजनीति में भाग लेने से दूर रखती हैं तथा वे भी इन बाधाओं के कारण राजनीति से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझती हैं। ये विभिन्न बाधक कारण इस प्रकार हैरू- भारतीय सामाजिक संरचना, महिलाओं में अशिक्षा, महिलाओं में संकोच, परिवार में निर्धनता, बालकऔर बालिकाओं में भेदभाव, नैतिकता का दोहरा मापदण्ड, महिलाओं की आर्थिक पराधीनता, महिलाओं में असुरक्षा का भय, राजनीतिक दलों में सत्ता प्राप्ति एवं दूषित प्रवृत्ति, खर्चीली चुनाव प्रणाली, महिलाओं में राजनैतिक जागरूकता का अभाव। महिलाओं के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर कर उन्हें राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि सम्पूर्ण महिला समाज ही राजनीति के मैदान में उतर पड़े और सत्ता सुख का उपयोग करें। वस्तुतः आवश्यकता इस बात की है कि महिलाओं को पुरूषों के समान एवं समकक्ष समाज में स्थान और सम्मान दिया जाये। उनको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश करने के समान अवसर उपलब्ध करवाये जायें, जिसमें वे सजग प्रहरी की भाँति राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश कर महिला समाज के अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ देश और समाज के विकास में पुरूषों के बराबर अपना यथाशक्ति योगदान कर सकें।
  महिलाओं की वर्तमान स्थिति को देखते हुए निम्नलिखित प्रयास किये जाने चाहिए ताकि भारतीय महिलायें अन्य क्षेत्रों की भाँति राजनीति क्षेत्र में प्रवेश कर देश की उन्नति में पर्याप्त योगदान दे सकेंरू-
1- सामाजिक संरचना को समानता के आधार पर गठित किया जाय।
2- महिलाओं में साहस, त्याग तथा निर्भिकता की भावनों का विकास करने हेतु उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना।
3- प्रारम्भिक स्तर से बालकऔर बालिकाओं को समान रूप से शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था करना।
4- समाज में सामाजिक परिवर्तन लाने हेतु समाज का नजरिया बदलना तथा महिलाओं में व्याप्त हीनता की भावना को खत्म करना।
5- प्रशासन द्वारा महिलाओं की सुरक्षा की पूर्ण गारन्टी एवं महिलाओं में बढ़ने वाले अपराधों के प्रति कठोर रूख अपनाना।
6- विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा महिलाओं को राजनीति के क्षेत्र में आने के लिए निःस्वार्थ प्रोत्साहित किया जाये। प्रत्येक राजनैतिक दल द्वारा अपने निजि स्त्रोतों या राजकीय अनुदान से महिला राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिए राहत कोष बनाये जायें।
7- हर स्तर पर महिला आयोग एवं सलाहकार बोर्ड स्थापित किये जायें।
8- प्रशाासन द्वारा समय-समय पर महिला आयोजनध्सम्मेलन आयोजित किये जायें जिसमें ग्रामीण महिलाओं को अधिक से अधिक संख्या में आमंत्रित किया जाय ताकि वे अपने सीमित क्षेत्र से बाहर निकल कर अपना राजनीतिक विकास कर सकें।
  भारतीय समाज में महिलाओं में राजनीतिक विकास जागृत कर उन्हें पुरूषों के समान स्तर पर लाने के लिए भारतीय समाज एवं प्रशासन दोनेां को ही समान रूप से सहयोग करना होगा। गरीबी कम करने, साक्षरता का प्रतिशत बढाने, बेरोजगारी कम करने तथा समाज में व्याप्त असमानता कोदूर करने के प्रयासों के केन्द्र में जब तक भारत की असंख्य नारी समूह को नहीं रखा जायेगा तथा जब तक स्वयं महिलायें अपनी स्थिति में बदलाव के लिए चैतन्य नहीं होंगी, तब तक राजनीति और सत्ता दोनेां ही महिला विकास और महिलाओं से दूर रहेंगे। यद्यपि कुछ हद तक महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता आई है और वे राजनीतिक वर्चस्व की खोज में चूल्हें-चैके से चैपाल की ओर रूख कर चुकीं हैं। राजनीति में जमीन तलाशती आज महिलायें दहलीज के पार हैं, कल तक उसके जो सपने पलकों में ही चिपके रहते थे, आज उन सपनों ने आकार प्राप्त करना शुरू कर दिया है।
  अतः यह स्पष्ट है कि महिलायें उस मुकाम पर पहॅुचेंगी तो जरूर जहाँ उन्हें पहॅुचना है। यदि वह सामाजिक आर्थिक आधार प्राप्त कर लें तो यह प्रक्रिया काफी तेज हो सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न करने में पुरूष प्रधान समाज एवं राजनेताओं को सहयोग देना होगा। दोनों को समय के बदलते परिवेश के अनुरूप अपने आपको ढालना होगा। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के महत्व को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने सिफारिश की थी कि विश्व की संसदों की कुल संख्या का न्यूनतम 30 प्रतिशत स्थान महिलाओं के लिए सुरक्षित होना चाहिए। जिसका अनुसरण पंचायतीराज व्यवस्था के द्वारा भारत में किया जा चुका है। सम्भवतः संसद और विधान मण्डलों में भी यह आरक्षण निकट भविष्य में स्वीकृत हो जायेगा। अतः महिलाओं की राजनीति में वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु महिलाओं में जागरूकता लाना और उन्हें नेतृत्व के लिए शिक्षित करना आवश्यक है।

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें