अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया और स्त्री विमर्श

पूरी मानवजाति भूमंडलीकरण के दबावों तले एक जुट होने और बाजारों द्वारा अनुशासित, विस्थापित होने को आज बाध्य है। राज्यसत्ता के परिसीमन तथा भूमंडलीकृत बाजारों के सहृदय पैरोकारों द्वारा तर्क जरूर दिया जा रहा है कि इस नयी व्यवस्था में मानव जीवन में राज्य और राज्य के संस्थानों का अवांक्षित हस्तक्षेप हटेगा और उन्मुक्त होकर पूंजी जब अधिक तेजी से प्रवाहित होगी, तो वह हमें लालफीताशाही से मुक्त करेगी और इस प्रक्रिया में हर किसिम के विकास को बल मिलेगा। इससे क्या पुरूष, क्या स्त्री, सभी का जीवन बेहतर होगा। इस तरह भूमंडलीकरण शब्द का मुख्य वैचारिक कार्य सारी दुनिया में राजनीति और अर्थव्यवस्था के साथ-साथ संस्कृति के परिदृश्य में भी हस्तक्षेप करना है।
    कुछ सीमित वर्गो को छोडकर यहाँ ही नहीं, दुनिया के हर देश में सबसे निचली श्रेणी की नागरिक स्त्री है। ज्यों-ज्यों उद्योग जगत में पढे लिखे हुनर का कब्जा और कम्पयूटरीकृत ज्ञान का संरक्षरण बढ़ा है,वे संगठित क्षेत्रों से बेदखल होती गयी हैं। उधर इस बात के भी ठोस प्रमाण हैं कि कृषि,तकनीकी प्रधान होती गयी है। बुनकरों तथा निर्माण कार्यों में भी,पारस्परिक क्षेत्रों में कहीं भी औरतों के लिए खास कामकाज नहीं बचा है। हुनरबंद बुनकरों या खेतिहरों के ओहदे से गिरकर आज वे चिंदी-चिथडे बीनने वाली, फेरीवालियां या भूमिहीन मजदूर बनकर रह गई हैं। उनकी आमदनी और स्वास्थ्य-स्तर दोनों घटे हैं और असुरक्षा बढ़ी है । बाजारवाद के इस दशक में औरतों के लिए यदि कोई कार्य क्षेत्र फैला है तो वह है देह व्यापार का, और यह अनायास ही नहीं है कि थाईलैण्ड से भारत तथा विकासशील देशों में स्त्री देह की मालदार पुरूषों द्वारा नितान्त अमानवीय और धृणित खरीद फरोख्त को अब उनके चंद स्वयंभू विदेशी पैरोकार स्वीकृत नारीवादी शब्दों के मुलम्में में लपेटकर कानून मान्य बनाने की चेष्टा कर रहे हैं।  कहा जाता है कि अपनी देह पर हक सिर्फ स्त्री का है। यदि वह खुद इसे बेचना चाहे तो सम्मानित कामगार की तरह खुलकर क्यों न बेचे? सम्मानजनक ढंग से रोजी-रोटी कमानेवाली स्वायŸा और सम्पन्न कामगार के रूप में मीडिया में भी उसे खूब बेचा जा रहा है और यही नहीं उसके लिए वैसी खास छूटों, रियायतों की भी पेशकश की जा रही है जैसी सामान्य मजदूरों को मिलती है।
     भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया में नारीवाद के झूठे  नारे उछालकर उनके पीछे स्त्री स्वत्व और सम्पूर्ण व्यक्तित्व का ऐसा ही चतुर अस्वीकार हमें कई प्रजनन, स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं , प्रयासों में भी देखने को मिल रहा है। भूमंडलीकरण की आड़ में यह खतरनाक खेल जारी है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया में कोख को पहले निजी धन बनाकर प्रचारित किया जाय और फिर औरत को फुसलाकर पश्चिम में अस्वीकृत गर्भ निरोधकों के ताबड़तोड़ प्रयोग से बंध्या बना लिया जाय अर्थात स्पष्ट है कि हम स्त्रियों के हित और प्रगति को भौतिक आधार पर ही देखने का कार्य कर रहे हैं।
    स्त्रियों के मानसिक आधार, एक लम्बी जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ावों में बदलती हुई उनकी रिश्तेदारियों, उनकी निजी भावनाओं, प्रेम अनुभूति वात्सल्य, आशंका दुविधा- इन सबको लेकर हमारे योजनाकारों और काफी हद तक नारीवादी लाबी के सरकारी और राजनैतिक प्रवक्ताओं में किसी भी तरह की गहरी दिलचस्पी या आदर का अभाव दीखता है। स्त्रियाँ पूरे समाज को जितनी आत्यंतिकता से और जितने सारे स्तरों पर ऊष्मा और साहचर्य देती रही हैं, उन सबको क्या हम मात्र रोटी कपड़ा और मकान एवं जाति आधारित प्रतिनिधित्व से ही जोड़ कर समेट या व्याख्यायित कर सकते हैं?
    इस बिन्दु पर आकर नयी सदी में भारत में नारीवादी सोच और अभिव्यक्ति की वर्तमान स्थिति पर तटस्थ और निर्मम विचार करना जरूरी हो गया है। वस्तुतः अपने मूल में नारीवाद एक विचारधारा से कहीं आगे जाकर एक स्त्री द्वारा अपने और दुनिया के बारे में अलग तरह से सोचने का ऐसा तरीका है, जो स्त्री तथा पुरूष दोनों के लिए मात्र पुरूषों की बनाई परम्परा के समानान्तर नया सोचने और समझने की नई-नई राहें खोलता है। बिडंबना ही है कि सदी के अन्त तक आते-आते (कुछ स्त्रियों की ना- समझी और कुछ राजनेताओं और संदिग्ध समाजसेवियों की समझदारी के कारण) नारीवादी विमर्श प्रायः हर जगह वाद-विवाद, पक्ष-विपक्ष, मेरा-तेरा और ममत्वहीन दुर्धर्ष भाषा का इस्तेमाल करता दीखने लगा है, यह गहरी बीमारी का लक्षण है।

    इस सदी में औरतों के हक में एक ही बात जाती है कि विश्व के किसी एक सरकार अथवा राजनैतिक विचारधारा के पास युगांतकारी दबाव लाने का माद्दा नहीं बचा है। आज सियेटल में अमरीका के अपने ही नागरिक सड़क पर उतरकर राज समाज को, अत्यांतिक पूॅंजीवादी अवधारणाओं को सरेआम पलीता लगा रहे हैं और यूरोप के किसान भी बहुराष्ट्रीय कम्पनी कारगिल द्वारा परखनली में गढे़ हुए खतरनाक टर्मिनेटर बाजों को समुन्दर में फेंक चुके हैं। नारी न तो राजनीति की चेरी है न ही उसकी दुश्मन! उसकी चिन्ता के मूल में वे जीवनमूल्य है जो स्त्रियों समेत पूरी मानव जाति के हित में है, जो स्त्रियों और उनके समर्थक सभी गुटों को न सिर्फ राज समाज की ज्यादती से बल्कि कई बार खुद अपने ही अतिवादी स्वरूपों से भी बचा सकते हैं। हम उम्मीद करेंगे कि आने वाले समय में नारीवाद नकली नाटकीय जुझारूपन के तेवर त्यागकर एक उदार संवेदनशील और संतुलित बुद्धि से अपने चारो ओर उस परिवेश का जायजा लेगा, जो आज ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की छाती-फाड़ अमानवीय और जीवन विरोधी स्पर्श में पगलाया हुआ है। इसके लिए जरूरी होगा कि नारीवाद सिर्फ राजनीति ही नहीं, अर्थ जगत, तकनीकी विज्ञान और मीडिया सभी के प्रतिनिधयों से जुड़े अपने लिए कुछ झूठे पूर्वग्रहों को साहस पूर्वक त्यागे और पूरी मानवजाति के पक्ष में खड़े होने और विहंगम पड़ताल करने का ठोस आधार बनाये।
    आज भी स्थिति बहुत बदली नहीं हैं। पढ़ी लिखी तेजस्वी स्त्रियां बहुधा आजीवन अकेली रह जाती है। लोग उनसे खार खाते हैं और उनके साथ कटखनी कटुता का जो मिथ जोड़ दिया जाता है, वह डायनपने के आरोप से बहुत भिन्न तो नहीं है। आज यह बात चर्चा में है कि बहुत जल्द विज्ञान पुरूषों को उस प्रविधि से भूषित कर देगा, जिससे वे अपना एक्स फैक्टर जब्तकर सिर्फ वाई-फैक्टर स्त्रियों के गर्भ में भेज सके। न आये एक्स फैक्टर न पैंदा होंगी लड़कियॉ। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। मगर सोचिये! बाँसुरी का बजना क्या इतना बुरा है? जरूरी है कि हर बांस का फट्टा ही बन जाए?
    हमारी त्रासदी है कि हम आज तक अतिरेकों में जी रहे हैं, लेकिन हमारा जो आने वाला कल है वह, विशेषकर स्त्रियों के सन्दर्भ में, सारे प्रचलित मिथक ऐसे तोड़ेगा, जैसे कभी निराला की नायिका ने पत्थर तोड़े थे।
    स्त्रियों सेे सम्बद्ध बहुत सारे मिथक तो पहले ही टूट चुके हैं, पर जो होने वाला है वह बहुत ही रोचक है। परिवार तेजी से टूट रहे हैं। आधुनिकता के पहले दौर में संयुक्त परिवार टूटे, टूटने ही थे। आज न्ूयक्लियर परिवार के इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान (पति-पत्नी और बच्चे) भी अक्सर तीन दिशाओं में छिटक गये से दीखते हैं। जो अपने आप में बहुत बड़ा विस्फोट है।
    हो सकता है कि वह स्थिति बहुत दिन न चले और मातृत्व के मिथ पर शहीद होना स्त्रियाँ भी छोड दें, तो क्या पुरूष सारा दायित्व उठा लेंगे? नौकरी, गृहस्थी, बाल-बच्चे? फीमेल इन्फेन्टीसाइड (बालिका बध) जिस तरह बढ़ रहा है उससे स्पष्ट है कि कई पुरूषों के बीच एक पत्नी हुआ करेगी और सब मिलकर एक कम्यून बना लें कि यह काम तुम्हारा है, यह मेरा है। ये भी हो सकता है कि किराये के गर्भ से बच्चे खरीदकर मर्द, स्त्रियों के बिना ही जीने की सोचें। अमरीका के तीन-चार टेलीविजन सीरियलों ने इधर स्त्रीविहीन घरों का महातम्य खूब बखना है और वे लोकप्रिय भी खूब हुए हैं। ‘माई थ्री संस‘, ‘द राइफल मैन’ और ‘बेचलर फादर! ऐसा भी हो जाना असम्भव नहीं है कि रक्त सम्बन्ध परिवार को बाँधने वाला तत्व न रह जाय और दोस्तों की तरह कुछ रिश्तेदार भी साथ रहने के लिए चुन लिये जायें। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में स्त्री और समाज की इस नयी मूल्य संरचना की आहट मिलने लगी है।
    पहले की स्त्रियाँ अपने सम्बन्धों का निर्वाह करती थीं, तो आर्थिक परतंत्राजन्य विवशता के कारण। आज की स्त्री को आर्थिक स्वतंत्रता है। पढ़ी-लिखी होने के कारण आत्मिक-बौद्धिक और नैतिक परिष्कार भी उनमें आया है। आज की ज्यादातर स्त्रियां परिवार संजोकर रखना चाहती हैं क्यों? साहचर्य जन्य स्नेह के कारण ही तो, और इस आरोपित चिन्ता के भार से भी किंचित-बच्चे उनके बिना गिर पड़ जायेंगे।
    अमेरिकन सिविल राइट्स की एक कार्यकर्ता के अनुसार ‘‘किसी हालीवुड सिनेमा के अन्त में, की तरह विवाह गोरी चमड़ी वाले प्रतिष्ठित समाज में जीवन की सम्भावनाओं का भी दण्ड होता है...........। अपने पूरे जीवन का वादा एक बार में कर देने की हिम्मत मुझ में नहीं। इस साल हो सकता है, मैं विवाहित रहना चाहॅू, पर अगले साल? ऐसा नहीं है कि विवाह नामक संस्था में मैं अनास्था व्यक्त कर रही हॅू बल्कि यह दृष्टिकोण मेरे प्रति सम्मान का प्रतिरूप है और सिविल राइट्स मूवमेंट की सीख का कि चीजों और पदों को अस्थाई समझो और उनमें तब तक जुड़ों तब तक तुम्हें लगे कि तुम इन्हें अपने व्यक्तित्व का सर्वोत्तम दे रहे हो।’’
    आधुनिक समय की बदकिस्मती देखें कि आज उसे अपनी लड़ाई खुली सड़क पर लड़नी पड़ रही है। इब्सन की नोरा की तरह न उसका कोई ‘‘गुडिया घर’’ है जिसका दरवाजा वह किसी के मुॅह पर बन्द कर सके।
    भारतीय समाज में पिछले लगभग तीन दशकों से इसी स्त्री का रूदन और हाहाकार गॅूज रहा है जिसके मन में स्वाधीनता की चाहत है पर हिम्मत नहीं, जिसकी अस्मिता जगी है पर पितृसत्ता की बेड़ियों में जकड़ी हुई है, जिसे मीठा-मीठा गप्प और कडुवा-कडुवा थू का लोभ है। वह स्वाधीनता जैसे बड़े मूल्य को अपनाना चाहती हैं।
    एक तर्क यह भी है कि स्वाधीनता का चुनाव अन्ततः अकेलेपन का चुनाव है और लम्बे अकेलेपन की परिणति इस अहसास में होती है कि सृजनात्मक सक्रियता जैसे एकाध अपवादों को छोड़कर कैरियर की सफलता जीवन में सार्थकता का स्त्रोत नहीं हो सकती, मातृत्व स्त्री को प्राकृतिक रूप से उपलब्ध सार्थकता का एक सहज अवसर है पर स्वाधीन स्त्री के लिए वह न सिर्फ कैरियर में बाधक है बल्कि अनावश्यक सिर दर्द एवं पराधीनता की कुंजी भी है। सामुदायिक, सामाजिक जीवन का वही पुराना पैटर्न सामने आता है कि एक शासक दूसरा शासित-एक शिकार दूसरा शिकारी यानी सार्थक मानवीय सम्बन्धों से स्वाधीनता का अहसास बाधित होता है तो एकान्त में सार्थकता का अहसास नष्ट हो जाता है। स्वाधीनता का कुछ अहसास ले-देकर बिना रोक-टोक के उठ बैठ सकना, बिना किसी की आज्ञा, अनुमति की मजबूरी के आ-जा पाना, खर्चा-वर्चा कर लेना ही है। अगर अभीष्ट न मिले तो दबाव, घुटन और मजबूरी को जिन्दा रहने के अहसास के पर्याय में तब्दील कर देता है। यानी मजबूरियों और दबाबों की सापेक्षता में तो स्वाधीनता अपने आप में सार्थक मूल्य है पर उनके अभाव में जीवन को किसी दूसरे बडे़ प्रयोजन की जरूरत पड़ती है। लेकिन बड़े से बड़ा प्रयोजन भी सम्बन्धों का, परिवार का शत-प्रतिशत विकल्प नहीं बन सकता है। तो क्या वही समझदार थी जिसे शुरू में सामान्य या मूर्ख समझा गया। रूदन और हाहाकार में अपना विरेचन करती, सम्बन्धों की सुरक्षा का कवच पहिने, अस्मिता और स्वाभिमान जैसे झंझटों में न पड़ती, वह सचमुच कोई अनामतोष स्वयं को दे पा रही है? यह समझदारी है या केवल कायरता का महिमा खण्डन? स्वाधीन के अतिरिक्त भी कोई सार्थक हो सकता है क्या? कौन जाने कहना मुश्किल है? इतना तो है ही, काफी भले न हो, स्त्री पराधीनता का चुनाव करने को भी स्वाधीन है। स्वेच्छा से चुनी पराधीनता क्योंकि बीसवीं सदी के अन्त तक औरत जितनी बदल चुकी है उतना शेष समाज नहीं। अब अपने रहने लायक जगह उसे कहाँ मिले?
    समाज यूँ नहीं बदला करता-वचनों-प्रवचनों, विवादों और विचार- धाराओं से उसको बदलने के लिये महामारी, अकाल, भूकम्प, बाढ़ जैसी कोई प्राकृतिक आपदा चाहिये या फिर युद्ध जैसी मानव रचित दुर्धटना क्योंकि ऐसे ही समय में मनुष्य की चेतना सामुदायिक रूप से इतना तत्पर, सतर्क और सानन्द होती है कि विचारों को शब्दों के धेरे में से निकाल कर कर्म में परिवर्तित कर दें? आयोजित और प्रयोजित भविष्य के दुस्साहस में दैवी अनुकम्पा जैसे अप्रत्याशितों की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती, तो फिर और चारा ही क्या है सिवा इसके कि यह जो उपलब्ध कच्चा माल हे - यही पुरूष , इसी को ठोंक- पीटकर स्त्री अपना मनचाहा साथी गढ़ ले, वरना संबन्धों का जो आदर्श स्वप्न उसके मन में है- समकक्षों का परस्पर स्वाधीन - सहभाव वह अपनी आकर्षक, उत्तेजक, विरोधाभासी चुनौतियों समेत एक कोमल कल्पना की तरह अनजिया ही रह जायेगा।
    भारतीय स्त्री के  परिपेक्ष्य में 20 वीं सदी के आखिरी पाँच दशक एक महत्वपूर्ण अर्द्धाली बनाते हैं। इसी अर्द्धाली के पहले चार दशकों के दौरान स्त्रियों को मतदाता की प्रतिष्ठा मिली जब कि इससे पूर्व इन्हें मत देने का भी अधिकार नहीं था। मतदाता की प्रतिष्ठा मिलने के बाद उनके मन में राष्ट्र के भाग्य निर्माण की सहभागिता के स्वप्न उभर आये और हर्षातिरेक के अनेक क्षण भी पैदा हुये, जब उनकी प्रतिनिधियों ने दुर्गम लक्ष्य हासिल किये, पुराने रिकार्ड और भ्रान्तियों को तोड़ा और समाज के सोच को सायास नई दिशा में मुड़ने को मजबूर कर किया। उधर तकनीकी और विज्ञान के निरन्तर विकास ने आयुष्य दर बढ़ाई, बाल मृत्यु दर घटाई, साक्षर स्त्रियों की संख्या में भारी बढोत्तरी भी पैदा की, लेकिन सामान्य स्त्री का जीवन मात्र ताजा कागजी आंकड़ों की मार्फत उतार चढ़ाव भरा ही नहीं रहा, ठोस ऐतिहासिक और सामाजिक-राजनैतिक घटनाओं के लम्बे साये भी उस पर पड़ते रहते हैं। लिहाजा स्त्रियों को कई किस्म के भय, पराधीन और अंधविश्वासी मूल्य से 90 के दशक तक आते-आते मुक्ति तो मिल चुकी थी किन्तु पूर्णतः नहीं।
    औरतों को दो पीढ़ियों की जद्दोजहद् से ताजा पीढी को स्वतंत्रचेता बनने की क्षमता तथा पारिवारिक जकड़बन्दी से जहाँ एक हद तक मुक्ति मिली है, वहीं कई एक क्षेत्रों में औरतें एक विस्मयकारी ढ़ंग से ‘स्वेच्छया मेरी मरजी’ कहते हुए पुनः एक नई प्रतिभागिता तथा विचारधाराओं के स्वतंत्र युग में प्रवेश कर रही है।
    वस्तुतः भूमंडलीकरण ने स्त्रियों को घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर रोजगार के नए अवसर प्रदान किए हैं, जिससे उनमें आत्म विश्वास एवं स्वतंत्रता जैसे बड़े जीवन मूल्य को पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर आत्मसान करने में मदद मिली है।
    निश्चय ही अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ी है। पारिवारिक मूल्येां के दायरे से बाहर निकलकर वे इसका विस्तार वैश्विक स्तर पर करना चाहती हैं। नयी मूल्य दृष्टि से पारिवारिक मूल्येां का सन्तुलन सामंजस्य बैठाना, उनके लिए चुनौती भरा है। वे प्रेम और संघर्ष जैसे मूल्य को एक साथ जी रही हैं। यह उनकी नयी पहचान है, इसे हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा।
                    

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