अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

नवउदारवाद, बाजारवाद और अवसरवादी राजनीति ने हिन्दी को बहुत पीछे धकेल दिया है-डा0. वैदिक


नवउदारवाद, बाजारवाद और अवसरवादी राजनीति ने हिन्दी को बहुत पीछे धकेल दिया है-डा0. वैदिक


डा0 वैदिक बोलते हुए साथ में बैठे हुए बाएं उदयप्रताप सिंह तथा दाएं शब्दम् अध्यक्ष श्रीमती किरन बजाज


कार्यक्रम विषय - हिन्दी मीडिया से वर्तमान एवं भविष्य को उम्मीदें तथा हिन्दी सेवी सम्मान
दिनांक      - 17 नवम्बर 2012
संयोजन               - शब्दम्
आमंत्रित अतिथि  - डा0 वेदप्रताप वैदिक, श्री उदयप्रताप सिंह
विशिष्ट अतिथि - शब्दम सलाहकार मंडल के सदस्य श्री उमाशंकर शर्मा, श्री मंजर उलवासै, डा0. ओ.पी. सिंह, डा0. महेश आलोक,  डा0. ध्रुवेन्द्र भदौरिया, डा0 रजनी यादव, श्री मुकेश मणिकान्चन एवं श्री बाल कृष्ण गुप्त, श्री अंशुमान बावरी, डा. सुशीला त्यागी, डा0 नरेन्द्र प्रकाश जैन, डा0. ए.बी. चैबे।
        
         शब्दम् का आठवां स्थापना दिवस पूर्णतः हिन्दी विमर्श को समर्पित था। इस अवसर  पर संस्था द्वारा हिन्दी के अग्रणी पैरोकार डा. वेदप्रताप वैदिक और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष श्री उदय प्रताप सिंह को उनकी हिन्दी सेवा के लिए सम्मानित किया गया।।
डा0 वैदिक एवं उदयप्रताप सिंह को सम्मानित करतीं शब्दम् अध्यक्ष श्रीमती किरन बजाज एवं शब्दम् सलाहकार मंडल के सदस्य
         
शब्दम् अध्यक्ष श्रीमती किरन बजाज बोलते हुए
                कार्यक्रम अदभुत और अनूठा इसलिए भी बन गया क्योंकि ‘शब्दम्’ संस्था संगीत के साथ साहित्य को समर्पित संस्था भी है। संस्था की अध्यक्ष श्रीमती किरण बजाज ने जब एल.सी.डी. के जरिए संस्था के कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया तो हिन्द लैम्पस् संस्कृति भवन में उपस्थिति बुद्धिजीवियों ने करतल ध्वनि से उसकी सराहना की। विगत वर्षों में संस्था द्वारा किए गए कार्यों में, चाहे वह ग्रामीण कवि सम्मेलन के जरिए हिन्दी की अलख जगाने का कार्यक्रम हो या पर्यावरण जागरूकता का हिन्दी सेवियों के सम्मान की श्रंखला हो या म्यूजिक कंसर्ट के कार्यक्रम, सभी कार्यक्रम समाज सेवा के यज्ञ में एक से बढ़कर एक आहुति के समान दिखाई दे रहे थे।     एस.सी.डी. के चित्रों की जीवन्तता ने सभी दर्शकों का मनमोह लिया। श्रीमती किरण बजाज ने इस प्रजेंटेशन के जरिए यह तो साबित कर ही दिया कि शब्दम् संस्था हर वर्ष नए प्रतिमान गढ़ रही है, जिनका लाभ न केवल फिरोजाबाद अंचल अपितु पूरे आगरा संभाग को मिल रहा है। संस्था के सुरूचिपूर्ण प्रबन्धन और कर्मठ कार्यकर्ताओं की सक्रियता के चलते पर्यावरणीय प्रदूषण के साथ ही सांस्कृतिक प्रदूषण को दूर करने में संस्था का प्रयास श्लाघनीय है।
अपने सम्मान से अभिभूत जब डा. वेदप्रताप वैदिक हिन्दी विमर्श पर बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने उदयप्रताप जी को सम्बोधित करते हुए कहा ‘‘मेरे जीवन की अविस्मरणीय सभा के अध्यक्ष जी मुझे आज यहा आकर बेहद प्रसन्नता हो रही है’’ दरअसल ‘शब्दम्’ का हिन्दी भाषा से बेहद लगाव है यही कारण है कि 2012 के शिक्षक दिवस पर सम्मानित होने वाले प्रो. नामवर सिंह जी भी गदगद हो गए थे।
अपने उद्बोधन के प्रारंभ में ही डा. वैदिक ने स्पष्ट कर दिया था कि वह केवल हिन्दी भाषा की स्थिति पर ही विमर्श को केन्द्रित करने का प्रयास करेंगे और बाद में उन्हों किया भी यही। वैदिक इस बात को लेकर बेहद आहत दिखे कि देश में चहुंओर अंग्रेजी का बोलबाला है। हिन्दी के प्रति दिलचस्पी न तो राजनेताओं में है और न उद्योगपतियों में। अंग्रेजी के आगे सम्पूर्ण भारतीय समाज भृत्य बनकर रह गय है। ‘‘अंग्रेजी के ऐसे घटाटोप में शब्दम् संस्था का हिन्दी प्रेम देखकर मुझे लगा जैसे शिकोहाबाद में कोई दाराशिकोह की तरह दीप जलाए बैठा है।’’ देश के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अंग्रेजी सीखने को ‘पांडित्य’ समझता है। अंग्रेजी का ऐसा घटाटोप ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भी देखने को नहीं मिला।
डा. वैदिक ने बताया कि वह पहले विद्यार्थी थे जो हिन्दी में शोधग्रन्थ लिखकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रस्तुत कर सके। प्रारंभ में उनके शोध को स्वीकार नहीं किया गया। नवउदारवाद, बाजारवाद और अवसरवादी राजनीति ने हिन्दी को बहुत पीछे धकेल दिया है। महात्मागांधी और डा. राम मनोहर लोहिया के बाद कोई ऐसा राजनेता सामने नहीं आया है जो हिन्दी के लिए संघर्ष कर सके। डाॅ. वैदिक ने स्पष्ट किया कि वह अंग्रेजी विरोधी नहीं है। उनकी कई पुस्तकें अंग्रेजी में लिखी गयी हैं तथा वह विदेशों में अंग्रेजी में व्याख्यान देते हंै लेकिन जिस तरह अंग्रेजी भारतवासियों पर थोपी जा रही है उसका वह विरोध करते है। उनका मानना है कि इस अंग्रेजी की वर्चस्वता के चलते देश में साठ करोड़ लोग बीस रू. से कम खर्च पर प्रतिदिन गुजारा करते हुए पशुवत जीवन जीने को विवश है। सेना का यह हाल है कि वहाॅं बहादुरी से गोलियां चलाने वाले का सम्मान नहीं होता, बल्कि अंग्रेजी में जुबान चलाने वाले का सम्मान किया जाता है। देश के अनुसंधान पर भाषा के माध्यम का असर पड़ रहा है। भारतीय प्रतिभाएं अपनी प्रतिभा का उपयोग पहले अंग्रेजी साीखने में करती हैं उसके बाद ही अनुसंधान की ओर बढ़ पाती है। अंग्रेजी के तिलिस्म के चलते गरीब भारतवासी का बच्चा आगे नहंी बढ़ पाता। उन्होंने भारतवासियों के अंग्रेजी प्रेम पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जो बच्चा अपनी मां (हिन्दी) को मां कहने में संकोच करता है वह मौसी (अंग्रेजी) की क्या इज्जत करेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उदयप्रताप जी को इंगित करते हुए वैदिक जी ने कहा कि आप हिन्दी संस्थान के जरिए ज्ञान-विज्ञान की श्रेष्ठ किताबों के हिन्दी अनुवाद का काम करवाइए ताकि छात्र-छात्राओं को लाभ मिल सके। अनुवाद के जरिए आप बहुत बड़ा काम कर सकते हैं।
उद्बोधन के अंत में डा. वैदिक ने श्रोताओं द्वारा उठाए गए प्रश्नों का समाधान भी प्रस्तुत किया।
डा0 महेश आलोक उदयप्रताप सिंह का परिचय देते हुए
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उ.प्र. हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदयप्रताप ने आश्वासन दिया कि वह हिन्दी संस्थान में रहते हुए हिन्दी के प्रचार-प्रसार और संवर्द्धन का काम करेंगे। उदयप्रताप ने डा. वैदिक से सम्बन्धित कुछ रोचक संस्मरण भी सुनाए जिनका श्रोताओं ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। संस्था की अध्यक्ष किरण बजाज ने आग्रह पर उन्होंने अपनी गजल के कुछ शेर सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
 डा0 ओ0 पी0 सिंह डा0 वैदिक का परिचय देते हुए
कार्यक्रम के प्रारंभ में डा. ओ.पी. सिंह एवं डा.महेश आलोक ने क्रमश:

डा. वैदिक एवं उदयप्रताप सिंह के व्यक्तिव और कृतित्व पर प्रकाश डाला।तथा डा0 ध्रुवेन्द्र भदौरिया ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन मुकेश मणिकांचन ने किया।

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