अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

अज्ञेय की काव्य दृष्टि: कुछ नोट्स- महेश आलोक


               अज्ञेय की काव्य दृष्टि: कुछ नोट्स
                       (तार सप्तक एवं दूसरा सप्तक के संदर्भ में)
                                                                                                     -   महेश आलोक
                                                                (1)
            हिन्दी कविता में ‘अज्ञेय’ की उपस्थिति एक बेहद विवादास्पद घटना की तरह याद की जाती रही है। खासकर ‘तार सप्तक’के प्रकाशन के बाद। लगभग बीस पच्चीस वर्षो तक तो ‘अज्ञेय’ जैसे कोई स्वतंत्र रचनाशील व्यक्ति नहीं रहकर, एक ऐसे प्रतीक हो गए थे कि जिसे समझने-समझाने में ही सारे नए को समझने-समझाने का मकसद पूरा होता दिखायी पड़ता था। अभी अधिकांश विश्वविद्यालयों के अनेक अध्यापक, आधुनिकता का जो भी अर्थ निकालते हैं, उसके लिए वे ‘अज्ञेय’ की याद को ‘भरोसा दिलाने की तरह’ अपने पास तैयार रखते हैं कि ‘नये का जिक्र आया तो-‘अज्ञेय’ को सामने रख दो।
          मजे की बात यह है कि ‘नये’ को अकादेमिक सूत्र की तरह पेश करने के सिलसिले में जिस तरह कभी अध्यापकों के दल ने ‘अज्ञेय’ का सहारा लिया था, उसी तरह आज ढेर सारे लोग प्रगतिशीलता को समझने-समझाने के लिए ‘अज्ञेय’ को गरियाने और ‘‘मुक्तिबोध’ का गुण गाने की लगभग अकादेमिक कसरत के सहारे ही ‘साहित्य के बाजर में अपना धन्धा चला रहे हैं। यही नहीं, बाद के वर्षो में शमशेर तक को ‘अज्ञेय’ के विरूद्ध हथियार बनाकर खड़ा किया गया। वही शमशेर-जिसे ‘अज्ञेय’ ने ‘‘कवियों का कवि’’ कहा था। रामदरश जी ने अपनी आत्मकथा ‘सहचर है समय’ में एक जगह लिखा है कि जब मैने शमशेर से पूछा कि शमशेर जी, आपकी कविताओं में जो बिम्बधर्मिता है, अमूर्तन का जितना गहरा प्रभाव और वस्तु को संश्लिष्ट बिम्बों के सहारे व्यक्त करने की अकुलाहट है, वह ‘अज्ञेय’ से कहीं ज्यादा है। फिर भी आप प्रगतिशीलों को अत्यन्त प्रिय हैं और लगभग इन्हीं वजहों से ‘‘अज्ञेय’’ अप्रिय। कारण समझ में नहीं आता। शमशेर ने बड़े सहज भाव से उत्तर दिया- ‘‘शायद इसकी एक प्रमुख बजह यह है कि ‘‘मैंने’’ ‘दूसरा सप्तक’ की अपनी भूमिका में यह कह दिया था कि ‘‘मार्क्सवाद’’ मेरे लिए आक्सीजन की तरह है।’’
                                                              (2)
                                   आधुनिकता ‘संस्कार’ है या ‘संवेदना’
          ‘‘नदी के द्वीप’’ कविता के उद्धरण से मैं अपनी बात शुरू करता हॅँू। कविता का एक छोटा सा अंश यहाँ उद्धृत है:-
                             ‘‘नदी तुम बहती चलो
                        भूखण्ड से जो दाय हमको मिला है, मिलता रहा है।
                        मांजती, संस्कार देती चलो’’
          यहाँ मांजकर, चमकाकर, संस्कार देते चलने की बात कही गयी है। ‘अज्ञेय’ के यहाँ यह बात बहुत महत्व रखती है। ध्यान देने की बात यह है कि ‘‘संस्कारवान’’ होने की क्रिया को ही वे ‘आधुनिकता’ मानते हैं। आत्मनेपद’’ में वे एक जगह कहते हैं’’ ‘आधुनिकता’ एक अनगढ़ चीज है। वह एक सिद्ध स्थिति नहीं, एक प्रक्रिया है। संस्कारवान होने की क्रिया को ही मैं आधुनिक मानता हॅू।’’
          ‘आधुनिकता’ का संस्कार! तो क्या लंबे समय से जो बात कही जाती रही है कि ‘‘आधुनिकता एक संवेदना’ है, ‘अज्ञेय’ उसका निषेध करते हैं? ‘अज्ञेय’ का सजग पाठक भी यहां थोड़ी उलझन में पड़ सकता है। असल में ‘‘संस्कार’’ और ‘‘संवेदना’’ के अंतर की बात भी सबसे पहले ‘अज्ञेय’ ने ही उठायी है। इस पर उन्होंने खुलकर विचार किया है। न केवल पद्य में बल्कि गद्य में भी। ‘अज्ञेय’ मानते हैं कि ‘‘संवेदना’’ पहले है और ‘‘संस्कार’’ बाद में । ‘‘संवेदना’’ ही संस्कार में ‘‘परिणमित’’ होती है, किन्तु विडम्बना यह है कि यह ‘‘संस्कार - ‘पुंजीभूत संस्कार’- स्वयं संवेदना के आड़े आ जाता है। आता ही है। संस्कार और संवेदना का सम्बन्ध लचीला बना रहे, ‘रागात्मक’ बना रहे, यही इष्ट है। सृजनशीलता उसी से संभव होती है, और उसी को संभव करती है। इस तरह ‘‘संवेदना’’ का दायित्व संस्कार के प्रति है और ‘‘संस्कार’’ का ‘‘संवेदना’’ के प्रति। ‘अज्ञेय’ के अनुसार - यही ‘संस्कारवान’ होने की प्रक्रिया है।’’ ‘संस्कारवान‘ होना इस बात पर निर्भर अवश्य करता है कि लेखक ने संवेदना के विस्तार के लिए ‘रचनात्मकता‘ और ‘स्वतंत्रता’ के हित में संवेदन का परिश्कार किया है अथवा नहीं। जितनी बड़ी परिधि मानव विरोधी मूल्यों के विस्तार की होती है, उतने ही विविध आयामों में ‘‘स्वतंत्रता’’ और ‘‘समता’’ की खोज विस्तार ग्रहण करती है और उतने ही बड़े पैमाने पर अनुभव के प्रतिमान बदलती है।
          अनुभव के प्रतिमान बदलने की यह आत्यंतिक क्रिया संवेदना के परिष्कार से ही संभव है और यह संभव ही तभी है जब लेखक, रघुवीर सहाय के अनुसार-संकारात्मक मानवीयता का पक्षधर हो
                                                          (3)
                                            काव्य दृष्टि
          ‘‘दूसरा सप्तक’ का प्रकाशन ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता’ के इतिहास में कई कारणों से महत्वपूर्ण उपलब्धि हैं। प्रथम तो यह कि ‘नयी कविता’ शब्द का प्रयोग प्रथम बार ‘अज्ञेय’ ‘दूसरा सप्तक’ की कविताओं के संदर्भ में करते हैं और कवियों को ‘नये कवि’ सम्बोधन से अभिहित करते हैं। निश्चित रूप से यह नया नामकरण ‘तार-सप्तक’ की आलोचना- प्रत्यालोचना के कारण चल पड़े नये काव्यान्दोलन ‘प्रयोगवाद’ की प्रतिक्रियास्वरूप आया। कवि और कविता दोनों को प्रयोगवादी कहने का जो फैशन चला, उससे ‘तार सप्तक’ के कवि आज तक उबर नहीं पाये हैं। इसलिए ‘दूसरा सप्तक’ के संग्र्रहीत कवि आरम्भ से ही किसी पूर्वग्रह के शिकार न बनें, अपने कृतित्व के ही आधार पर परखे जायें। शायद यही सोचकर नया नामकरण करने की जरूरत महसूस की गई। इसे और स्पष्ट करते हुए ‘अज्ञेय’ आगे लिखते हैं- ‘इन नये कवियों को भी कदाचित् प्रयोगवादी कहकर उनकी अवहेलना की जायें, या- जैसा कि पहले भी हुआ-अवहेलना के लिये यही पर्याप्त समझा जाये कि इन कवियों ने जो प्रयोग किये हैं, वे वास्तव में नये नहीं हैं, प्रयोग नहीं है। ऐसा कहना इन कवियों के बारें में उतान ही उचित या अनुचित होगा-जितना कि पहले ‘सप्तक’ के: हमारी धारणा है, कि उससे भी कम उचित होगा..... तथापि सभी को ऐसी उपलब्धि हुई है, जो प्रयोग को सार्थक करती है। प्रयोग के लिये प्रयोग इनमें से भी किसी ने नहीं किया है, पर नयी समस्याओं और नये दायित्वों का तकाजा सबने अनुभव किया है, और उससे प्रेरणा सभी को मिली है। ‘दूसरा सप्तक’ नये हिन्दी काव्य को निश्चित रूप से एकदम आगे ले जाता है और कृतित्व की दृष्टि से लगभग सूने आज के हिन्दी क्षेत्र में आशा की नयी लौ जगाता है।
          ‘अज्ञेय’ ने ‘तार सप्तक’ की कविताओं और कवियों को प्रयोगवादी कहने का तीव्र विरोध करते हुए प्रयोग क्या है? इसकी समुचित व्याख्या करते हुए ‘दूसरा सप्तक’ की भूमिका में लिखा- ‘प्रयोग का कोई वाद नहीं है, हम वादी नहीं रहे, नहीं है। न प्रयोग अपने आपमें इष्ट या साध्य है। ठीक इसी तरह कविता का भी कोई वाद नहीं है। कविता भी अपने आप में इष्ट या साध्य नहीं है। अतः हमे प्रयोगवादी कहना उतनी ही सार्थक या निरर्थक है, जितना कि हमें कवितावादी कहना। क्योंकि यह आग्रह तो हमारा है, कि जिस प्रकार कविता रूपी माध्यम को बरतते हुए आत्माभिव्यक्ति चाहने वाले कवियों को अधिकार है, कि उस माध्यम का अपनी आवश्यकता के अनुरूप श्रेष्ठ उपयोग करे, उसी प्रकार ‘आत्मसत्य’ के अनवेषी कवि को अन्वेषण के प्रयोग रूपी माध्यम का उपयोग करते समय उस माध्यम की विशेषताओं को परखने का भी अधिकार है।’ इस स्पष्टीकरण से आपत्तिकर्ताओं को उत्तर मिल जाना चाहिए था- बहुतों को मिला- बहुतों को नहीं मिला। डा0 नामवर सिंह को ‘तार सप्तक’ और ‘दूसरा सप्तक’ के कथनों में बल का अपसरण दिखाई पड़ा- उनके अनुसार- ‘तार सप्तक’ में जहां ‘राहों के अन्वेषण की बात की गई थी, ‘दूसरा सप्तक’ में ‘बल आत्म-अन्वेषण परगया।’ ‘राहों के अन्वेषी’ का अर्थ नामवर जी ने वस्तुगत क्षेत्र में भटकने वाला लिया है। शायद इसीलिए उन्होंने ‘दूसरा सप्तक’ के ‘आत्मसत्य के अन्वेषी पद को लेकर दो स्पष्ट विभाजन कर दिया- ‘राहों का अन्वेषण’ और ‘आत्म अन्वेषण’। ‘अज्ञेय’ ने ‘तार सप्तक’ में लिखा- संग्रहीत कवि सभी ऐसे होंगे, जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हैं जो यह दावा नहीं करते कि काव्य का सत्य उन्होंने पा लिया है, केवल अन्वेषी ही अपने को मानते है। आगे फिर- ‘ये किसी मंजिल पर पहुंचे हुए नहीं हैं अभी राही है, राही नहीं, राहों के अन्वेषी। कथन से स्पष्ट है, कि मंजिल है- ‘काव्य सत्य’ को जानना- और ये कवि ‘काव्य सत्य’ के अन्वेषण करने की दिशा में अग्रसर हैं-यानि ‘काव्य सत्य’ किस प्रकार उपलब्ध हो, उन रास्तों का अन्वेषण कर रहे हैं (ध्यान रहे कि ‘दूसरा सप्तक’ में अज्ञेय ने उस प्रक्रिया को स्पष्ट किया हैं- जिससे ‘वस्तु सत्य’ ‘आत्म सत्य’ बनता है - तारसप्तक में जिसका स्पष्टीकरण नहीं था, यहां उसका स्पष्टीकरण है- इसलिए स्पष्टीकरण को उसी संदर्भ में रखकर देखना उचित है) ‘काव्य सत्य’ क्या है- ‘वस्तु सत्य’ के साथ रागात्मक सम्बन्ध अर्थात् ‘व्यक्ति सत्य’ या ‘अनुभूत सत्य’ या ‘आत्मसत्य’। अन्वेषण क्या है?- प्रयोग रूपी माध्यम के द्वारा ‘काव्य सत्य’ को उपलब्ध करने की प्रक्रिया और उस ‘अनुभूत सत्य’ या ‘आत्मसत्य’ को समष्टि तक पहुंचाना है -‘बल‘ वाली बात यहां कहां है- समझ में नहीं आता। आगे देखे हैं- कुछ और भी सूक्ष्म अन्वेषण नामवर जी ने किये हैं।
           ‘तार सप्तक’ के अपने वक्तव्य में ‘अज्ञेय’ ने आधुनिक कवि की समस्या का उल्लेख करते हुए लिखा था, ’कवि आधुनिक जीवन की एक बहुत बड़ी समस्या का सामना कर रहा है। भाषा की क्रमशः संकुचित होती हुई सार्थकता की केंचुल फाड़कर उसमें नया, अधिक व्यापक, अधिक सारगर्भित अर्थ भरना चाहता है और अहंकार के कारण नहीं, इसलिए कि उसके भीतर इसकी गहरी मांग स्पंदित है- इसलिए कि वह ‘व्यक्ति सत्य’ को ‘व्यापक सत्य‘ बनाने का सनातन उत्तरदायित्व अब भी निबाहना चाहता है पर देखता है, कि ‘साधारणीकरण’ की पुरानी प्रणालियां जीवन के ज्वालामुखी से बहकर, आते हुए लावा से ही भरकर और जमकर रूद्ध हो गयी हैं। प्राण संचार का मार्ग उनमें नहीं है....... जो व्यक्ति का ‘अनुभूत‘ है, उसे ‘समष्टि’ तक कैसे पहुंचाया जाये- यह पहली समस्या है, जो प्रयोगशीलता को ललकारती है और यह कि ‘कवि का कथ्य उसकी आत्मा का सत्य है .... यह भी कहना ठीक होगा कि वह सत्य व्यक्तिबद्ध नहीं है- व्यापक है, और जितना ही व्यापक है, उतना ही काव्योत्कर्षकारी है... व्यापकता वैसे भी सापेक्ष्य है, जीवन की बढ़ती हुई जटिलता के परिणामस्वरूप व्यापकता का घेरा क्रमशः अधिकाधिे सीमित होना चाहता है। ‘दूसरा सप्तक’ में ‘अज्ञेय’ ने और स्पष्ट करते हुए लिखा- ‘राग वहीं रहने पर ‘रागात्मक सम्बन्धों की प्रणालियां‘ बदल गयी हैं- और कवि का क्षेत्र रागात्मक सम्बन्धों का क्षेत्र होने के कारण इस परिवर्तन का कवि कर्म पर बहुत गहरा असर पड़ा है। निरे तथ्य और सत्य में- या कह लीजिये ‘वस्तु सत्य’ और ‘व्यक्ति सत्य’ में- यह भेद है, कि सत्य वह तथ्य है, जिसके साथ हमारा रागात्मक सम्बन्ध है: बिना इस सम्बन्ध के वह एक ‘बाह्य वास्तविकता’ है, जो तद्वत काव्य में स्थान नहीं पा सकती। लेकिन जैसे-जैसे ‘बाह्य वास्तविकता’ बदलती है- वैसे-वैसे हमारे उससे रागात्मक सम्बन्ध जोड़ने की प्रणालियां भी बदलती हैं, और अगर नहंी बदलतीं, तो उस ‘वाह्य वास्तविकता‘ से हमारा सम्बन्ध टूट जाता है। अब नामवर जी के कथन पर आते हैं। नामवर जी ने दोनों कथनों की परीक्षा करके यह निष्कर्ष निकाला कि ‘दूसरा सप्तक’ में ‘व्यक्ति सत्य’ को ‘वस्तु सत्य’ की दिशा में विस्तृत करने की अपेक्षा ‘रागात्मकता’ के द्वारा ‘तथ्य को सत्य’ बनाने पर बल है। यहां आत्मविस्तार के स्थान पर आत्मसात करने पर विशेष बल है........ और आगे ‘अज्ञेय’ के इस काव्य सिद्धान्त की नवीनता यह है, कि इसमें बड़े कौशल से ‘तार-सप्तक’ की परम्परा को ‘आत्मनिष्ठ मोड़ दे दिया गया। ‘वस्तुतत्व’ निःशेष हो गया तथ्य में और फिर वह भी ‘रागात्मकता’ के अधीन होकर अपनी रही-सही ‘वस्तुनिष्ठता’ खो बैठा। इस प्रकार ‘वस्तु सत्य‘ सिमटकर ‘आत्मसत्य’ हो गया है। अगर दोनों कथनों पर ध्यान दें तो स्पष्ट होगा कि ‘तार-सप्तक’ के वक्तव्य में कवि कर्म के लक्ष्य की ओर संकेत किया गया था जो कि सनातन दायित्व है। ‘दूसरा सप्तक’ में कवि कर्म की ‘रचना प्रक्रिया’ पर विचार किया गया है। वस्तु-सत्य, आत्मसत्य बनता कैसे है- इसकी ओर संकेत किया गया है- सनातन दायित्व तो अब भी वही है- ‘अनुभूत सत्य‘ अथवा ‘आत्म-सत्य’ को समष्टि तक कैसे पहुंचाया जाए। नामवर जी की पैनी दृष्टि की विशेषता यह है कि पहले तो उन्होनें ‘व्यापक-सत्य’ को ‘वस्तु-सत्य’ की परिधि में घसीटा और फिर ‘रचना- प्रक्रिया को ही लक्ष्य समझकर निष्कर्ष दे बैठे। ‘आत्मसत्य’ को समष्टि तक कैसे पहुंचाया जाये- यह संप्रेषण की समस्या है- जिसके लिए कवि प्रयोग करता है- प्रयोग क्या है- इसे स्पष्ट करते हुए ‘अज्ञेय’ ने लिखा- ‘प्रयोग अपने आपमें इष्ट नहीं है, वह साधन है और दोहरा साधन है। क्योंकि एक तो वह उस सत्य को जानने का साधन है, जिसे कवि प्रेषित करता है, दूसरे वह उस प्रेषण की क्रिया को और उसके साधनों को भी जानने का साधन है- अर्थात् प्रयोग द्वारा कवि अपने सत्य को अच्छी तरह जान सकता है और अच्छी तरह अभिव्यक्त कर सकता है। वस्तु और शिल्प दोनों क्षेत्रों मे प्रयोग फलप्रद होता है। यानी वस्तुगत या तथ्यगत क्षेत्र में प्रयोग द्वारा वस्तु तत्व- आत्मसत्य बनने की प्रक्रिया से गुजरता है और शिल्प के क्षेत्र में प्रयोग संप्रेषण के लिए आवश्यक है- जिससे आत्मसत्य को ‘व्यापक सत्य’ बनाया जा सके, उसे समष्टि तक पहुंचाया जा सके।
          ‘नयी रचना’ क्या है- इसे स्पष्ट करते हुए ‘अज्ञेय’ लिखते हैं - कवि नये तथ्यों को उनके साथ नये रागात्मक सम्बन्ध जोड़कर नये सत्य का रूप दे, उन नये सत्यों को प्रेष्य बनाकर उनका ‘साधारणीकरण’ करे यही नयी रचना है। इसे ‘नयी कविता’ का कवि नहीं भूलता। अर्थात् ‘साधारणीकरण’ ही कवि का लक्ष्य है- जिसका संकेत ‘तार-सप्तक’ में किया जा चुका था। असल में नामवर जी की कठिनाई दूसरी है- जिससे विश्लेषण में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है। ‘वह ‘नयी कविता’ में दो धाराएं शामित करते हैं- एक प्रगतिशील, दूसरी उसकी विरोधी। इन दोनों को सही साबित करने के लिए उन्हें दो प्रतिमान चाहिए जिनके परस्पर विरोध को सही सावित करने के लिये आत्मगत सत्य का खण्डन जरूरी है और आत्मगत सत्य का खण्डन ‘अज्ञेय’ के खण्डन के बिना सम्भव नहीं है’ परिणाम क्या हुआ- ‘फैक्टस’ को ‘डिस्टर्बड’ कर दिया गया- जिसे हम पहले दख चुके हैं।

                                                          (4)
                                           ऐसा कोई घर देखा है आपने

फिर बहकी हवा
बालू की झील में उठी लहर
फिर मिट गई छाया कोई
ऊंट की गड्डर की गड़ेरिन की
मालिन की रानी की              
टूटा
नीरव एक तारा
टूटी
कड़ी मेरी अंतहीन कहानी की 
फिर पिपिया वह अकुलाया परेवा
फिर निकल चले वे
छाया न छोड़ते
रातों रात
         
यह ‘मरूस्थल’  की रात का एक बिम्ब है या इस बिम्ब में अनेक रेगिस्तानी विम्बों की अंधड़ भरी गूँजें हैं और यह ‘अज्ञेय’ की कविता है। उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक ऊर्जा को नये सिरे से पारिभाषित और नवीकृत करती हुई। ‘मरूस्थल’ शीर्षक या श्रृंखला की कई कविताओं में से एक कविता या उसका अंश है यह, जो ‘अज्ञेय’ ने जीवन के अंतिम दिनों में लिखी थी। जिन्होंने इस श्रंृखला की कविताएॅ पढ़ी या सुनी है। वे जानते है कि 75 वर्ष की उम्र में ऐसे कविताएं लिखकर अपने रचनाकर्म का बिल्कुल नया रूप रखने वाला कवि एक असाधारण और मिथकीय प्रतिभा का धनी था।
          पिछले 75 बर्षो के भारतीय साहित्य में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को छोड़कर ऐसा कोई रचनाकार नहीं हुआ, जिसके व्यक्तित्व और रचनाकर्म को शब्दों में समेटना एक चुनौती भरा काम हो। वे उन दुर्लभ लोगों में से थे जो अपने जीवनकाल में ही किवदन्ती बन जाते है। वे जहाॅ भी पहुॅचते थे लोग अपने आप बौने हो जाते थे, ताज्जुब की बात यह नहीं है, यह है कि जहाॅ वे नही होते थे, विवाद के केन्द्र में भी अकेले वहीं होते थे। यह अकारण नहीं था कि लगभग आधी शताब्दी तक हिन्दी में अज्ञेय की उपस्थिति सदैव केन्द्रीय बनी रही। भारतीय साहित्य में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद वे फिर अकेले साहित्यकार थे, जिनका प्रभाव हिन्दी के अलावा दूसरी भाषाओं के रचना कर्म पर भी उसी तीव्रता के साथ दूर-दूर तक ग्रहण किया गया।
          अब यह संयोग सा लगता है कि ‘अज्ञेय’ ने अपने अन्तिम काव्य संकलन का नाम दिया था- ‘ऐसा कोई घर देखा है आपने’। यह भी आकस्मिक लगता है कि उन्होंने अपने आहाते में एक ‘हवाघर’ बनाया था। बहुत पहले गालिब ने एक सपना देखा था:-
मंजिल एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से इधर होता काश के मकाँ अपना।  
अज्ञेय ने एक ऐसा ही घर बनया है।
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1 टिप्पणियाँ:

बेनामी ने कहा…

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