अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

हिन्दी दिखावे की भाषा नहीं है, आत्म-सम्मान की भाषा है

                                 हिन्दी दिखावे की भाषा नहीं है, आत्म-सम्मान की भाषा है
           (नारायण महाविद्यालय में ‘हिन्दी दिवस’ पर परिचर्चा एवं प्रश्न-मंच का आयोजन)’



‘हिन्दी का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता।देश को विकसित और शिक्षित करने के लिए हिंदी का महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा घोषित करने की मांग भी उठाई जानी चाहिये।हिन्दी दिखावे की भाषा नहीं है, वह झगड़ों की भाषा भी नहीं है। हिन्दी अपने अस्तित्व से लेकर ’आज तक कितनी ही सखी भाषाओं को अपने आंचल से बांध कर हर दिन एक नया रूप धारण करती है।’ नारायण महाविद्यालय में हिन्दी परिषद,हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित ‘हिन्दी दिवस’ पर परिचर्चा में मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए प्रख्यात साहित्यकार रमेश पंडित ने ये बात कही।अध्यक्ष पद से बोलते हुए प्रख्यात हिन्दी सेवी उमाशंकर शर्मा ने कहा कि ‘हिन्दी ने फारसी, अरबी, उर्दू से लेकर अंग्रेजी तक को आत्मीयता से अपनाया है।  सारी भाषाएं संस्कृत की बेटियां हैं। बड़ी बेटी का होने का सौभाग्य हिन्दी को मिला, लेकिन इससे अन्य भाषाओं का महत्व कम नहीं हो जाता। हम हिन्दी से विमुख नहीं हो सकते।’ उन्होने कहा कि ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रति जागरूकता पैदा करने और हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य
उमाशंकर शर्मा,प्राचार्य डा०वी०के०सक्सेना,डा०अखिलेश श्रोत्रिय,डा०महेश आलोक
मुख्य अतिथि रमेश पंडित बोलते हुए
से ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन’ जैसे समारोह भी किए जाते हैं।’चर्चा को आगे बढ़ाते हुए विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा0अखिलेश श्रोत्रिय ने कहा कि ‘ विविध जातियों, धर्मों एवं भाषाओं वाले इस देश को, जिसे कवीन्द्र रवीन्द्र ने ‘महामानवे समुद्र’ कहा है, उसे एकता के सूत्र में पिरोने का काम हिन्दी ही करती है। इसलिए राजभाषा होने के साथ-साथ विशाल जन-समुदाय द्वारा बोली-समझी जाने के कारण हिन्दी को हमारे देश की राष्ट्रभाषा होने का गौरव भी प्राप्त होना चाहिये।’हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं युवा कवि-आलोचक डा0महेश आलोक ने कहा कि ‘ हमे हिन्दी को बाजार की भाषा नहीं बनाना   है,बल्कि हिन्दी का इतना बड़ा बाजार विकसित करना है कि अंग्रेजी सहित अन्य भाषाएं इसकी अनुगामिनी बनें।हिन्दी आत्म-सम्मान की भाषा है।’ प्रख्यात व्यंगकार अरविन्द तिवारी ने  कहा कि ‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक, साक्षर से निरक्षर तक प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति हिन्दी भाषा को आसानी से बोल-समझ लेता है, पर प्रान्तीय अथवा अन्य भाषीय लोगों के बीच हिन्दी का प्रयोग कर वह अपने विचारों को आसानी से पहुंचा सकता है।’ प्राचार्य डा0वी0के0सक्सेना ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि ‘राष्ट्रीय कर्तव्य एवं अधिकार की दृष्टि से भी हिन्दी के प्रयोग एवं प्रचार हेतु मनाया जाने वाला हिन्दी-दिवस एवं हिन्दी पखवाड़ा विशेष महत्वपूर्ण है। जो न केवल हिन्दी के प्रयोग का अवसर प्रदान करता है, बल्कि इस बात का भी ज्ञान दिलाता है कि हिन्दी का प्रयोग भारतीय जनता का अधिकार है।’
पुरस्कृत छात्र एवं शब्दम सलाहकार मंदल के सदस्य
 इसके पश्चात ‘हिन्दी परिषद एवं शब्दम्  के सयुक्त तत्वावधान में ‘हिन्दी प्रश्नमंच’ का आयोजन किया गया,जिसमें छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह से भाग लिया।कार्यक्रम का संचालन डा0महेश आलोक ने किया तथा मंजर-उल-वासे ने छात्र-छात्राओं से हिन्दी दिवस एवं व्याकरण संबन्धी प्रश्न पूछे।छात्र-छात्राओं ने कहा कि इस कार्यक्रम से उनका ज्ञानवर्धन हुआ है और भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिये।इस अवसर पर रमेश पंडित,अखिलेश श्रोत्रिय, अरविन्द तिवारी एवं महेश आलोक ने अपनी कविताएं भी सुनायीं,जिसने कार्यक्रम को रसमय बना दिया।
इस अवसर पर डा0अनुपमा चतुर्वेदी,डा0 हेमलता सुमन, डा0रेखा जैन, डा0जमदग्नि, डा0ए0के0एस0चैहान, डा0कुलदीप कुमार, डा0वेदानन्द त्रिपाठी, डा0 मृदुला यादव, डा0 रेखा पचैरी, उदय प्रताप, नूतन एवं सैकड़ों छात्र-छात्राएं तथा महाविद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी उपस्थित थे।    
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