अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं

बुधवार, 18 नवंबर 2015

महेश आलोक की बेतरतीब डायरी



कुछ कवितानुमा टिप्पणियाँ(महेश आलोक की बेतरतीब डायरी)


                                                               (1)

मैं सचमुच चिन्तित हूं। क्या मेरी पीढ़ी की युवा कविता रैखिक आग्रह, या सामयिकता के रैखिक दबाव में लिखी जा रही है कि उसे जीवन में सुख-उल्लास का निरंतर अभाव शुष्क से शुष्कतर किए जा रहा है। ऐसा कहते हुए मैं स्वयं को कटघरे में खड़ा पाता हॅू ।क्या हम उल्लास, राग और उत्सव को कविता के लिए त्याज्य विषय मानने लगे हैं? क्या इससे कविता का जीवन बहुत छोटा नहीं हो गया है? क्या हम यांत्रिक, रूढ और एकरैखिक दृष्टि के शिकार हो रहे हैं? क्या हम सचमुच मानने या स्वीकार करने लगे हैं कि प्रकृति और मनुष्य के बीच के रागात्मक सम्बन्ध और संपर्क को दूर करके, कविता में हम ‘आधुनिक’ होने का हक अदा कर पा रहे हैं? क्या हम ऐसा करके तथाकथित यांत्रिक आधुनिकता का शिकार नहीं हो रहे हैं? जबकि इसी ‘सम्बन्ध और संपर्क’ को सर्जनात्मक स्तर पर ज्यादा ‘रेडिकल’ होने के लिए ‘कलात्मक टूल’ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता था।
मेरा सचमुच मानना है कि आज की समकालीन हिन्दी कविता में - ‘ पंत का सहज भोलापन, औत्सुक्य, बाल सुलभ मासूमियत, प्रकृति के साथ की रागात्मक अद्वितीयता और शब्दों की ध्वन्यात्मक अर्थ सघनता की समझ एवं सांगीतिक लय’ का , उसके वर्तमान सर्जनात्मक रूपाकार में सहज समावेश हो जाए, तो उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थवत्ता एक नयी सौन्दर्य दृष्टि से जगमगा उठेगी।

                                                               (2)

मेरठ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग(अध्यक्ष- प्रो0नवीन चन्द्र लोहनी(चर्चित व्यंग्यकार,साहित्यकार)  द्वारा बिल्कुल नए कवियों को आमंत्रित कर एक गोष्ठी आयोजित की गयी। लगभग तीस अति युवा कवि आमंत्रित किये गये।मुझ जैसे प्रौढ़ को भी आमंत्रित किया गया टिप्पणी करने के लिये। मैने इतना अतिरेक और गुस्सा अपनी पीढ़ी के कवियों में नहीं देखा। युवा कवि कविता में यथार्थ के नाम पर, निर्भीकता के नाम पर निपट गाली गलौज वाली भाषा तक उतर आये हैं।दलील यह है कि बिना इस भाषा के यथार्थ के दोहरे चरित्र को अंकित नहीं किया जा सकता। वही पुराना  तथाकथित प्रगतिशील तर्क कि हम ‘कन्टेन्ट’ को ज्यादा महत्व देते हैं, शिल्प तो उसी के अनुसार ढल जाता है। यह केवल दस से बीस प्रतिशत सही है। बिना शिल्प या अन्दाजे-बयानी में प्रयोग किये एक ही साँचे में ढली कविता ही लिखी जा सकती है और उसके यथार्थ का चेहरा इतना इकहरा होगा कि एक ही तरह का मास्क लगाये जोकरों की टोली नजर आयेगी तमाम कविता,जैसा उस दिन नजर आयी।
तुलसी,गालिब और निराला इसीलिये बार-बार पढे जाने चाहिये कि ये मौलिक कहाँ हैं?  

                                                         (3)

आज भी गोष्ठियों में अज्ञेय और मुक्तिबोध को लेकर तलवारें खिंच जाती हैं।हम यह क्यों नहीं समझते कि हिन्दी कविता के विकास को समझने के लिये दोनो का समान महत्व के साथ बने रहना ही नहीं, दो पैरलल रेखाओं की तरह हमारी समझ में विकसित होना भी जरुरी है।कब तक वादग्रस्त आलोचना की लाठी से अज्ञेय को पीटते रहेंगे। मैं शानी की इस बात से सहमत हूँ कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद इतनी विराट प्रतिभा लेकर कोई दूसरा साहित्यकार पैदा नहीं हुआ ,जिससे जुड़ना और जिसका रचनात्मक विरोध करना, दोनो साहित्य के विकास के लिये जरुरी हो। असल में अज्ञेय का मूर्खतापूर्ण विरोध उन्ही उत्साही वादी लेखकों या संघों ने ज्यादा किया है, जिन्होने अज्ञेय को अधूरा पढ़ा है या बिल्कुल नहीं पढ़ा है। हमारे आका विरोध कर रहे हैं इसलिये हमें भी विरोध करना चाहिये- ‘अज्ञेय विरोध’ में यही प्रवृत्ति ज्यादा दिखलाई पड़ती रही है।



   

1 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें